Archive for March, 2008

Daastaan-e-dil

In Gazal aur Nazm, Meri Gazal | No Comments

दोस्ती जिससे भी की, वही रकीब निकला
मोहब्बत जिससे भी हुई, वही काफिर निकला

दुनिया की भीड़ में जो बड़ी दूर अजनबी था
उसी के साथ सदियों का राब्ता निकला

सबसे मासूम जान पड़ता था पूरे चमन में
फूल आखिर वही बेदर्द कातिल निकला

बचाना चाहा जिससे हमेशा दिले-बिस्मिल को
वही खंजरे-अदा मेरे मुन्तजिर निकला

हिलायते-इश्क बहुत सुने इस जहाँ में लेकिन
हर किस्साए-वफ़ा मेरा किस्सा निकला

चर्चे होते थे जिसके तेरे आशिकों की महफ़िल में
शोखिए-हिना में तेरी मेरा ही खून निकला

बेइज्जत करके मुझे, लुत्फ़ आये उन्हें
उनकी महफ़िल से इसलिए मैं शर्मसार निकला

देकर जख्मे-दिल मिझे बहुत शादमां हैं वो
लेकिन हर इक जख्म मेरा उनका आशिक निकला
 

figaar // March 7th, 2008

Mudawa (treatment)

In Meri Gazal | No Comments

दर्दे-इश्क की दवा है कोई?
मतलब दवा का समझाए कोई?

दर पे बैठे हुए तकते रहे पहरों-पहर
इस इन्तजार में कि आता है कोई?

ख्वाबों का इक महल बनाया हमने
मकीं होना था किसे, मकीं हुआ कोई?

सासों के थमने से ही मौत नहीं होती
मेरे कातिल को ये बतलाये कोई?

मेरे क़त्ल के बाद की उसने ज़फा से तौबा
ऐसे कातिल का भला क्या करे कोई?

वफ़ा, ईमान, इंसानियत, जिनसे-किताब हैं जहाँ
ऐसी दुनिया का भला क्या करे कोई?

नाम को लिखना तेरे देता है मजा विसाल सा
इश्क में जूनून की हद बतलाये कोई?

इब्ने-मरियम भी दे नहीं सकती मरहम
ऐसे “फिगार” का मुदावा क्या करे कोई?
 

figaar // March 7th, 2008

Main chahta hoon

In Meri Gazal | 2 Comments

हाँ मैं भी ज़माने की तरक्की चाहता हूँ
पर पहले लोगो को इंसान बनाना चाहता हूँ

मज़हबों के नाम पर नफरतों का बीज बोते हैं जो
ऐसे खूनी दरिंदों का मैं खात्मा करना चाहता हूँ

खुदा-भगवान् से पहले इंसानियत की बंदगी हो
अन्जुमने-इर्फानी में मैं आवाम की शिरकत चाहता हूँ

मेरी कौम, मेरा मुल्क, मेरा मज़हब से बहार निकल कर
आदमी को आदमी के लिए फिक्रमंद चाहता हूँ
हर रिश्ते टिके हैं जहाँ तवक्को की बुनियाद पर
ऐसी दुनिया में एक रिश्ता बे-तवक्को चाहता हूँ

सफरे-हयात में जो रक्खे फिगार को नशे में
तेरी आँखों से मैं वो जाम पीना चाहता हूँ

figaar // March 3rd, 2008