Main chahta hoon
In Meri Gazal | 2 Commentsहाँ मैं भी ज़माने की तरक्की चाहता हूँ
पर पहले लोगो को इंसान बनाना चाहता हूँ
मज़हबों के नाम पर नफरतों का बीज बोते हैं जो
ऐसे खूनी दरिंदों का मैं खात्मा करना चाहता हूँ
खुदा-भगवान् से पहले इंसानियत की बंदगी हो
अन्जुमने-इर्फानी में मैं आवाम की शिरकत चाहता हूँ
मेरी कौम, मेरा मुल्क, मेरा मज़हब से बहार निकल कर
आदमी को आदमी के लिए फिक्रमंद चाहता हूँ
हर रिश्ते टिके हैं जहाँ तवक्को की बुनियाद पर
ऐसी दुनिया में एक रिश्ता बे-तवक्को चाहता हूँ
सफरे-हयात में जो रक्खे फिगार को नशे में
तेरी आँखों से मैं वो जाम पीना चाहता हूँ
beautiful
GOOD…