Daastaan-e-dil

In Gazal aur Nazm, Meri Gazal | No Comments

दोस्ती जिससे भी की, वही रकीब निकला
मोहब्बत जिससे भी हुई, वही काफिर निकला

दुनिया की भीड़ में जो बड़ी दूर अजनबी था
उसी के साथ सदियों का राब्ता निकला

सबसे मासूम जान पड़ता था पूरे चमन में
फूल आखिर वही बेदर्द कातिल निकला

बचाना चाहा जिससे हमेशा दिले-बिस्मिल को
वही खंजरे-अदा मेरे मुन्तजिर निकला

हिलायते-इश्क बहुत सुने इस जहाँ में लेकिन
हर किस्साए-वफ़ा मेरा किस्सा निकला

चर्चे होते थे जिसके तेरे आशिकों की महफ़िल में
शोखिए-हिना में तेरी मेरा ही खून निकला

बेइज्जत करके मुझे, लुत्फ़ आये उन्हें
उनकी महफ़िल से इसलिए मैं शर्मसार निकला

देकर जख्मे-दिल मिझे बहुत शादमां हैं वो
लेकिन हर इक जख्म मेरा उनका आशिक निकला
 

figaar // March 7th, 2008

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